नमस्ते, पाठकों स्वागत है आपका मेरी ब्लॉग साइट पर। आज में एक नई कहानी के साथ प्रस्तुत हूं जिसके सारे पात्र काल्पनिक हैं मेरी कहानी का शीर्षक है ‘ बुजुर्गों का घर में महत्व ‘
ब्रजभूषण आज 70 साल के हो गए वे 50 साल के आयु से सहसा अंधे हो गए थे शायद उम्र का तकाजा रहा होगा की वे सहसा अंधे हो गए। ख़ैर क्या कर सकते हैं जैसा भगवान को मंजूर।
आज सुबह उनका बेटा राहुल अपने बेटे जय के साथ उनके पास आता है और जन्मदिन की शुभकामनाएं देता है वे सोचते हैं कि जय तो हर बार उनके पास आता है पर राहुल का आना उन्हें कुछ खटका फिर सोचा हो सकता है भगवान ने शायद उसकी बुद्धि पलट दी हो ।
राहुल उनसे कहने लगता है चलो आज बाहर घूम के आते हैं आज तुम्हे बाहर पार्क तक ले चलता हूं। पिछे से जय कहने लगता है मैं भी चलूंगा। राहुल उसे डांटकर मना कर देता। ब्रज भूषण राहुल से कहते हैं इसे भी ले चलो ना । राहुल कहता है आपको नहीं पता ये आपके लाड़ प्यार में बिगड़ गया है पढ़ता ही नहीं है। फिर वह जय को डांटता है और कहता है जाकर अंदर पढ़ो ।
राहुल फिर ब्रज भूषण को पकड़ – पकड़कर बाहर ले जाता है। वे ब्रज भूषण को गाड़ी में बैठने को कहता है। ब्रज भूषण पूछते हैं गाड़ी में बैठने की क्या जरूरत है पार्क तो पास में ही है। राहुल कुछ हड़ – बड़ाकर कहता है वो…मुझे थोड़ा काम करना है और वहीं पास में एक पार्क है… तो हम वहीं चलते हैं। इसी बातचीत के दौरान राहुल ब्रज भूषण को गाड़ी में बैठा देता है।
करीब आधे घंटे बाद वे लोग पार्क तक पहुंच जाते हैं राहुल ब्रज भूषण को गाड़ी से उतारता है और पार्क की एक बेंच पर बैठा देता । फिर राहुल एक पर्चे पर कुछ लिखता है और फिर ब्रज भूषण से कहता है इसे अपने पास रख लो इस में मेरा फोन नंबर है अगर जरुरत पड़े तो इस पर मुझे कॉल करा देना … मैं जरा काम कर के अभी आता हूं तब तक आप यहीं बैठे रहना। ब्रज भूषण हां में सिर हिला कर कहते हैं जल्दी आना।
पूरा एक घंटा बीत जाता पर राहुल नहीं आता । ब्रज भूषण सोचते हैं इतना समय हो गया परन्तु राहुल आया क्यों नहीं … वह सही तो होगा … ऐसा नहीं सोचना चाहिए मुझे… वह आता ही होगा। परन्तु एक घंटा और बीत जाता पर राहुल नहीं आता। तभी एक आदमी उनके पास आता है और उनकी बेंच पर बैठ जाता है और पूछता है क्या हुआ आप कुछ चिंतित लगते हैं । ब्रज भूषण पूछते हैं आपका परिचय… क्या आप मुझे जानते हो… क्या तुम्हे मेरे बेटे ने भेजा है?
वह व्यक्ति अपना परिचय देते हुए कहता है मेरा नाम जय है। ब्रज भूषण आश्चर्य से कहते हैं क्या तुम्हारा नाम … जय है… तुम्हे पता है मेरे पोते का नाम भी जय है। जय कहता है आप मुझे अपना ही समझिए… वैसे आप यहां क्या कर रहे हैं। ब्रज भूषण जय को पूरी बात बता देते हैं। जय कहता है तो आप मुझे अपना पर्चा दीजिए में आपके बेटे को कॉल कर देता हूं। ब्रज भूषण अपनी जेब से पर्चा निकाल कर जय को दे देते हैं।
जय वह पर्चा खोलता है। पढ़ते ही उसकी आंखो से आंसू निकलने लगते हैं । उस पर्चे में लिखा हुआ था ‘ ये मेरे पिता जी हैं जिन्हें भी मिलें वो इन्हें वृद्ध आश्रम में छोड़ दे ‘। जय सोचता है कि ऐसे सज्जन पुरुष जिन्हें दिखाई भी नहीं देता उनका बेटा उन्हें वृद्ध आश्रम छोड़ने की सोचता है। ब्रज भूषण पूछता है क्या हुआ कॉल लगीं कि नहीं। जय कहता है कि आप मेरे घर चलिए। ब्रज भूषण कहतें पर मैं तुम्हारे घर कैसे चलूं… मेरा बेटा आने वाला होगा। जय ना चाहते हुए भी पर्चे पर जो लिखा था वह पढ़कर ब्रज भूषण को सुना देता है।
ब्रज भूषण कहते हैं ठीक है तो बेटा तुम मुझे वृद्ध आश्रम छोड़ दो। जय कहता है नहीं आज से आप मेरे घर पर रहेंगे… मेरे पिता का देहांत हो चुका है तब से में अनाथ हूं पर आज आपको देखकर लगता है कि आपको मेरे लिए स्यंव भगवान ने भेजा है आप आज से मेरे पिता हैं। जय ब्रज भूषण को अपने साथ ले जाता है और वे खुशी खुशी रहने लगते हैं जय का परिवार ब्रज भूषण को अपने घर के बड़े के भांति स्वीकार कर लेते हैं और ब्रज भूषण भी उन्हें अपने परिवार की भांति प्रेम करने लगते हैं। जय का घर मानो स्वर्ग सा बन जाता है ।
वहीं दूसरी और राहुल के घर में रोज झगड़ा होने लगता है और राहुल को बिज़नेस में काफी नुकसान हो जाता है।
शिक्षा:- हमें अपने बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए,। उनके रहते है घर स्वर्ग रहता है ।
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